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श्रावस्ती के जंगल: जहां प्रकृति ने छिपा रखा है आयुर्वेद का अनमोल खजाना
- दैनिक लोक भारती
- 22 Jul, 2026
रीठा से लेकर गिलोय, अश्वगंधा और शतावरी तक... तराई के जंगलों में बिखरी हैं सैकड़ों औषधीय वनस्पतियां
उत्तर प्रदेश का सीमावर्ती जिला श्रावस्ती केवल भगवान बुद्ध की तपोभूमि, प्राचीन धरोहरों और जैव विविधता के लिए ही नहीं जाना जाता, बल्कि यहां के घने जंगल आयुर्वेदिक औषधीय पौधों का भी एक अनमोल खजाना समेटे हुए हैं। नेपाल की तराई से सटे श्रावस्ती के वन क्षेत्र सदियों से ऐसी जड़ी-बूटियों और औषधीय वृक्षों का प्राकृतिक घर रहे हैं, जिनका उल्लेख आयुर्वेद के प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। भिनगा जंगल (ककरदरी व हरदत्तनगर गिरंट जंगलों के साथ) लगभग 18,000 हेक्टेयर (180 वर्ग किलोमीटर) के क्षेत्रफल में फैला हुआ है। यह सघन वन क्षेत्र बेशकीमती साखू, सागौन व खैर के पेड़ों के लिए प्रसिद्ध है और यहाँ तेंदुए, हिरन व जंगली सूअर जैसे वन्यजीव पाए जाते हैं।समय-समय पर प्रकाशित समाचारों में भी यह उल्लेख किया गया है कि श्रावस्ती के जंगलों में बड़ी संख्या में औषधीय वनस्पतियां पाई जाती हैं, लेकिन इनके संरक्षण और वैज्ञानिक उपयोग की दिशा में अपेक्षित कार्य नहीं हो सका है।वन विशेषज्ञों के अनुसार श्रावस्ती के जंगलों में रीठा, हरड़, बहेड़ा, आंवला, गिलोय, अर्जुन, बेल, शतावरी, अश्वगंधा, कालमेघ, चिरायता, पलाश, नीम, सहजन, सफेद मूसली, ब्राह्मी, भृंगराज, तुलसी और गुडमार जैसी अनेक औषधीय वनस्पतियां प्राकृतिक रूप से विकसित होती हैं। इन पौधों का उपयोग आयुर्वेदिक दवाओं, स्वास्थ्यवर्धक उत्पादों और प्राकृतिक उपचारों में किया जाता है।
रीठा: जंगल का प्राकृतिक शैम्पू
श्रावस्ती के जंगलों में मिलने वाला रीठा सबसे महत्वपूर्ण औषधीय वृक्षों में गिना जाता है। इसके फलों में प्राकृतिक सैपोनिन पाया जाता है, जो पानी में झाग बनाता है। यही कारण है कि सदियों से रीठा का उपयोग प्राकृतिक शैम्पू, साबुन और कपड़े धोने के लिए किया जाता रहा है।आयुर्वेद में रीठा को त्वचा रोगों, बाल झड़ने की समस्या, रूसी, सिर की सफाई तथा कुछ प्रकार के संक्रमणों में उपयोगी माना गया है। आज जब लोग रासायनिक उत्पादों से दूरी बनाकर प्राकृतिक उत्पादों की ओर लौट रहे हैं, तब रीठा की मांग देश-विदेश में लगातार बढ़ रही है।
त्रिफला का आधार: हरड़, बहेड़ा और आंवला
श्रावस्ती के जंगलों में पाए जाने वाले हरड़, बहेड़ा और आंवला आयुर्वेद की प्रसिद्ध औषधि त्रिफला के मुख्य घटक हैं। यह मिश्रण पाचन तंत्र को मजबूत करने, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और शरीर के शुद्धिकरण के लिए उपयोग किया जाता है।
गिलोय: अमृत समान औषधि
गिलोय को आयुर्वेद में "अमृता" कहा गया है। श्रावस्ती के जंगलों में पेड़ों पर लिपटी हुई गिलोय प्राकृतिक रूप से मिल जाती है। इसका उपयोग बुखार, प्रतिरक्षा क्षमता बढ़ाने और कई आयुर्वेदिक उपचारों में किया जाता है।
अर्जुन और बेल की उपयोगिता
अर्जुन की छाल हृदय स्वास्थ्य के लिए आयुर्वेद में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है, जबकि बेल का फल और पत्तियां पाचन संबंधी समस्याओं में लाभकारी मानी जाती हैं। श्रावस्ती के वन क्षेत्र इन दोनों वृक्षों के लिए भी अनुकूल माने जाते हैं।
शतावरी और अश्वगंधा
महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए उपयोगी शतावरीतथा शरीर की शक्ति और तनाव कम करने के लिए प्रसिद्ध अश्वगंधा जैसी बहुमूल्य औषधीय वनस्पतियां भी तराई क्षेत्र में पाई जाती हैं। इनकी मांग आयुर्वेदिक उद्योग में लगातार बढ़ रही है।
क्यों घट रही हैं दुर्लभ वनस्पतियां?
वन विभाग और पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती आबादी, अवैध कटान, जंगलों में मानवीय हस्तक्षेप, अनियंत्रित चराई, आग लगने की घटनाएं और जलवायु परिवर्तन के कारण कई दुर्लभ औषधीय पौधों की संख्या धीरे-धीरे कम हो रही है। यदि समय रहते इनके संरक्षण पर गंभीर प्रयास नहीं किए गए तो आने वाली पीढ़ियां इस प्राकृतिक धरोहर से वंचित हो सकती हैं।
शोध और संरक्षण की जरूरत
विशेषज्ञ लंबे समय से मांग करते रहे हैं कि श्रावस्ती में औषधीय पौधों के संरक्षण, अनुसंधान और प्रसंस्करण (प्रोसेसिंग) केंद्र स्थापित किए जाएं। इससे न केवल दुर्लभ वनस्पतियों का संरक्षण होगा बल्कि स्थानीय किसानों और वनवासियों को रोजगार के नए अवसर भी मिलेंगे। यदि औषधीय पौधों की वैज्ञानिक खेती को बढ़ावा दिया जाए तो श्रावस्ती हर्बल और आयुर्वेदिक उद्योग का एक प्रमुख केंद्र बन सकता है।
रोजगार का नया अवसर
आज देश और दुनिया में हर्बल उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में श्रावस्ती के जंगलों में उपलब्ध औषधीय वनस्पतियों का वैज्ञानिक उपयोग स्थानीय अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सकता है। रीठा, आंवला, हरड़, बहेड़ा और अन्य औषधीय पौधों के संग्रह, प्रसंस्करण और विपणन से हजारों लोगों को रोजगार मिल सकता है।
प्रकृति की इस धरोहर को बचाना होगा
श्रावस्ती के जंगल केवल हरियाली का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि आयुर्वेद, पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य की अमूल्य धरोहर भी हैं। यदि इन जंगलों में मौजूद औषधीय पौधों का संरक्षण किया जाए, वैज्ञानिक शोध को बढ़ावा मिलेऔर
स्थानीय समुदाय को इससे जोड़ा जाए, तो यह क्षेत्र भविष्य में देश के प्रमुख हर्बल हब के रूप में अपनी पहचान बना सकता है।
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